उड़ीसा के कंधमाल ज़िले में पिछले दिनों हुई हिंसा मामले में पहली बार ईसाई नेताओं ने माना है कि इसमें ईसाई लोग भी शामिल थे.
कंधमाल ज़िले में पिछले हफ्ते हुई सांप्रदायिक हिंसा की जांच के लिए राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का तीन सदस्यीय दल प्रभावित इलाक़ों का दौरा करेगा और स्थिति की समीक्षा करेगा. पिछले हफ्ते 25 दिसंबर को विश्व हिंदू परिषद के बंद के दौरान हुई हिंसा के बाद 27 दिसंबर को ब्राह्मणीगांव में की हथियारबंद लोगों ने हमला किया था और अब ईसाई नेताओं का कहना है कि इसमें ईसाई लोग शामिल थे. भुवनेश्वर में पत्रकारों से बातचीत में कटक-भुवनेश्वर के आर्चबिशप रेव राफेल चेन्नाथ ने माना कि ब्राह्णणीगांव पर हुए हमले में ईसाई शामिल थे जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई थी और करीब 70 घर जला दिए गए थे. उनका कहना था ' हम इस हिंसा की निंदा करते हैं, किसी भी प्रकार का भड़कावे में आकर हिंसा करना ग़लत है. ईसाईयों को कभी हिंसा नहीं करनी चाहिए.' ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल के महासचिव जॉन दयाल ने भी हिंसा की निंदा की. दयाल ने 20 पृष्ठों की एक रिपोर्ट भी जारी की जिसमें कंधामल में हुई हिंसा के लिए पूर्ण रुप से राज्य सरकार को ज़िम्मेदार ठहराया गया. अब जहां एक तरफ ईसाई नेता मान रहे हैं कि 27 दिसंबर को हुए हमले में ईसाई लोग शामिल थे वहीं दूसरी ओर उड़ीसा की पुलिस पहले की कह चुकी है कि इस हमले में माओवादियों का भी हाथ था. अल्पसंख्यक आयोग का दौरा सोमवार को उड़ीसा के मुख्य सचिव अजीत त्रिपाठी और गृहसचिव तरुण कांति मिश्र आयोग के सदस्यों से मिलेंगे और अपनी सूचनाओं से उन्हें अवगत करवाएँगे. मंगलवार को आयोग के सदस्य कंधमाल में ब्राह्मणी गाँव के दौरे पर जाएँगे और वहाँ जाकर सांप्रदायिक दंगों के पीड़ित लोगों से और चर्च के सदस्यों से मिलेंगे. अल्पसंख्यक आयोग लौटकर एक बार फिर राज्य सरकार के अधिकारियों से चर्चा करेगा और फिर लौटकर दिल्ली में केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट देगा. उल्लेखनीय है कि गत 25 दिसंबर को क्रिसमस के मौक़े पर कई चर्चों पर हमले किए गए थे. कंधमाल ज़िले में ब्राह्मणी गाँव सहित कई गाँवों में लोगों पर भी हमले किए गए थे और ईसाई समुदाय के लोगों के घर जला दिए थे. बाद में यह सांप्रदायिक दंगों में बदल गया था और वहाँ कई दिनों तक कर्फ़्यू लगाना पड़ा था.
http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2008/01/080106_orissa_christian.shtml
Jul 25, 2008
'हिंसा में ईसाई भी शामिल थे' - आर्चबिशप
Posted by
contributor
at
8:46 AM
0
comments
Labels: BBC news, ईसाई गतिविधियां
गंगा-जमुनी संस्कृति, या पहचान का सवाल
ज्योत्सना सिंह
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
सोहन सिंह इन दिनों काफ़ी खुश हैं कि वो अब 'पूरी तरह से' हिंदू हो गए हैं. 42 वर्षीय सोहन ने हाल ही में अपने परिवार की परंपराओं के ख़िलाफ़ जाकर हिंदू रीति से अपनी माँ का दाह संस्कार किया.
सोहन सिंह राजस्थान के कठात समुदाय से हैं. ऐसी मान्यता है कि राजस्थान के चार ज़िलों में फैले मेहरात, कठात और चीता समुदाय के क़रीब 10 लाख लोग हिंदू राजपूत राजा पृथ्वीराज चौहान के वंशज हैं.
इस समुदाय के लोगों का इस्लाम से भी गहरा संबंध है. कई शताब्दी पहले इनके पूर्वजों ने मुग़ल बादशाहों की तीन शर्तें मान ली थी जिसके तहत मुसलमानों में प्रचलित रीति रिवाज़-सुन्नत कराना, हलाल माँस खाना और मरने के बाद लोगों को दफ़नाना शामिल है. एक तरह से देखें तो इस समुदाय के लोग भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब का जीता-जागता उदाहरण हैं. लेकिन इससे धर्म आधारित अस्मिता का संकट भी उनके सामने उठ खड़ा हुआ है. मसूदा कस्बे के एक व्यस्त बाज़ार में इन समुदायों के लोग बड़ी संख्या में हर रोज़ इकट्ठा होते हैं. कुछ लोग अपने आप को मुसलमान कहते हैं तो कुछ समझते हैं कि वो हिंदू हैं. लेकिन ज़्यादातर लोगों का कहना है कि धर्म का उनके लिए कोई ख़ास मतलब नहीं है. हम अपने परिवार में होली, दिवाली मनाते हैं लेकिन हम नमाज़ भी पढ़ते हैं और ईद भी मनाते हैं. हमारे परिवार की यही परंपरा है दीपा, मसूदा निवासी दीपा, जिनकी उम्र 60 वर्ष है, कहते हैं, "हम अपने परिवार में होली, दिवाली मनाते हैं लेकिन हम नमाज़ भी पढ़ते हैं और ईद भी मनाते हैं. हमारे परिवार की यही परंपरा है." ब्याबर शहर से 15 किलोमीटर दूर रसूल चाय की दुकान चलाते हैं. वे कहते हैं, "हिंदू या मुसलमान होना हमारे लिए कोई मायने नहीं रखता. हमारे दादा-दादी हिंदू थे लेकिन हमारा परिवार अब मुसलमान बन गया है."
'घर वापसी'
लेकिन 65 वर्षीय शांता के लिए धर्म एक बड़ा मुद्दा बन गया है. वे कहती हैं कि उनके कई संबंधी मुसलमान हैं. उनका कहना है, "मेरा बेटा कहता है कि क्यों हम ऐसे परिवार में पैदा हुए जहाँ इतना भ्रम है. मैंने अपने बेटे से कहा है कि वह मेरे मरने के बाद मुझे जलाए. मेरे संबंधी हमसे नाराज़ हैं." शांता का दामाद हिदू धर्म के प्रचार के लिए काम कर रही विश्व हिंदू परिषद जैसी संस्थाओं से जुड़ा हुआ है. विश्व हिंदू परिषद (विहिप) जैसी संस्थाएँ कहती हैं कि वे इन लोगों को अपनी सही पहचान कराने में मदद कर रही है. पिछले कुछ वर्षो में विहिप 'घर वापसी' जैसे कार्यक्रम के अन्तर्गत ऐसे लोगों का 'शुद्धिकरण' करके हिंदू धर्म में वापस लाने का प्रयास कर रही है. ब्याबर ज़िले में विहिप के ज़िलामंत्री नितेश गोयल कहते हैं, "हम इन्हें इनका इतिहास याद दिलाते हैं कि ये असल में पृथ्वीराज चौहान जैसे हिंदू राजा के वशंज हैं. लेकिन इनके अंदर कुछ कुरीतियाँ आ गई हैं जिसे दूर करके वे फिर हिंदू धर्म में वापस आ सकते हैं." गोयल ज़ोर देकर कहत हैं कि लोग उके पास ख़ुद आते हैं और किसी तरह का धर्मांतरण का प्रचार नहीं किया जाता है. उधर मुस्लिम संस्थाएँ भी अपने प्रचार में सक्रिय हो गई हैं. जमात-ए-इस्लामी की राजस्थान इकाई के अध्यक्ष सलीम इंजीनियर का आरोप है कि 20-25 वर्ष पहले तक, जब विहिप ने अपना कार्यक्रम शुरु किया, मुस्लिम संस्थाओं को इस बारे में जानकारी तक नहीं थी. वे कहते हैं, "सैकड़ों साल पहले मेहरातों ने अपने-आपको मुसलमान घोषित कर दिया लेकिन उन्हें पता नहीं था कि इस्लाम क्या है इसलिए वे स्थानीय संस्कारों से जुड़े रहे." इंजीनियर तबलीगी जमात जैसी संस्थाओं को इन इलाक़ों में मेहरात समुदायों में इस्लाम धर्म के प्रचार को सही ठहराते हैं. वे कहते हैं, "सरकार जो काम नहीं कर पाई हम वो कर रहे हैं. पूरे भारत में मुस्लिम समुदाय आधुनिक शिक्षा पाना चाहती है. हम इसके साथ उन्हें उनके धर्म की भी शिक्षा देते हैं. इसमें कौन सी बुराई है." लेकिन धर्म के इस संगठित रुप को अपनाने की ज़ोर देने के कारण मिश्रित पहचान वाले परिवारों पर काफ़ी दबाव बढ़ गया है.
http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2008/07/080714_hindu_homecoming.shtml
Posted by
contributor
at
8:39 AM
0
comments
